Monday, March 9, 2015

"नारी, तू नारी की असली दुश्मन"

नारी, क्यों बनती हो नारी की दुश्मन ?

जन्म-उपरान्त पुत्री के अपने,
क्यों रोता है तेरा कोमल मन ?
शिक्षा, वस्त्र, खान-पान में,
क्यों करती पुत्री की उपेक्षा तुम ?
नारी, क्यों बनती हो नारी की दुश्मन ?

बेटे केलिए जो है जायज,
बेटी केलिए वही नाजायज ?
पुरुष प्रबल समाज के भय से,
जंजीरों में उसको लपेटती हो क्यों ?
नारी, क्यों बनती हो नारी की दुश्मन ?

कमजोर, अबला, असहाय का,
अहसास दिलाती हो क्यों हरदम ?
समाज-परिवार ने दिया जो तुमको,
क्यों बेटी को लौटती हो सब तुम ?
नारी, क्यों बनती हो नारी की दुश्मन ?

जब देखोगी बेटी में अपने को,
पूरा करेगी तुहारे सपने को।
मत बन तू पैरों की बेड़ी,
आत्मनिर्भर बनने दे उसको।
नारी, क्यों बनती हो नारी की दुश्मन ?

बहुत सहा है अपमान तूने,
मत कर अब और नादानी।
बन जा तू ढाल अपनी बेटी की,
करने दे जरा उसको भी मनमानी।
नारी, मत बन तू नारी की दुश्मन......"ReNu"


Copyright© reserved by Poetess Asha Prasad "ReNu"

   

Friday, February 20, 2015

"दासत्व"


हैं निखर आये वो कैसे,
आज मेरे रंग में रंगकर।
सिर झुकाये रहते थे जो,
आज चलते हैं वो तनकर।
 

मानकर बैठे थे अबतक,
दासता है उनकी किस्मत।
तोड़कर अपने इस भरम को,
हैं अचंभित वो अपने ऊपर।।

हक़ नहीं देता है कोई,
प्यार से अगर मांगने से।
छीनने में ही है भलाई,

हर्षित हैं वो ये जानकर।।

निर्बलों को रौंदना,
सदियों से चलता रहा है।
बदल दिया इस परंपरा को,

बाहुबली से वो मुक्त होकर।। "ReNu"

Copyright© reserved by Poetess Asha Prasad "ReNu"

Wednesday, July 9, 2014

चाक पर रखी गीली मिट्टी से,
अपने सपनों को कर रही साकार। 
कल्पना को कोमल उँगलियों से,
बिटिया दे रही अभिनव आकार। "ReNu"

Copyright© reserved by Poetess Asha Prasad "ReNu" 

Tuesday, July 8, 2014

शब्दों को आँखों में उतार लिया है मैंने,
ताकि बधिर पशु-पक्षी भी मेरी भाषा समझ सके....."ReNu"

Copyright© reserved by Poetess Asha Prasad "ReNu"        

Monday, February 3, 2014

**काश, मैं मंत्री जी की भैंस होती **


काश, हम मंत्रीजी की भैंसिया होती भैया ......

विदेशी शैम्पू से स्विमिंग पूल में नहैती,
महंगा बॉडी लोशन से मालिश करवैती,
हमर रूप के चका-चौंध देख-देख के,
मिस यूनिवर्स भी जलती।।
काश, हम मंत्रीजी की भैंसिया होती भैया ……

जमके सलाद-सब्जी के छप्पन भोग लगैती,
संतरा, अनार, अंगूर के खूब जूस पीती,
देश की जनता पानी में जाये,
हमत मौज उड़ैती।।
काश, हम मंत्रीजी की भैंसिया होती भैया ……"ReNu"

Sunday, October 6, 2013

*मन*

ओ, मानव तू क्यों भागे हैं
मन के पीछे-पीछे…….
छलिया है यह छल लेगा ,
पल-पल रास्ता बदलेगा ।
कभी शिखर चढ़ जायेगा ,
कभी भू-गर्भ जा बैठेगा ।
थक जायेगा, गिर जायेगा ,
इसके पीछे भागते-भागते ।
ओ, मानव तू क्यों भागे हैं
मन के पीछे-पीछे…….

मन के आगे हो जाता है ,
प्रकाश-गति भी धीमी ।  
पलभर में यह सैर करा दे ,
तुमको पूरे ब्रह्मांड की ।
भूत-भविष्य में ले जायेगा ,
मदारी बनके नचायेगा ।
बन्दर बनकर रह जायेगा ,
इसके पीछे नाचते-नाचते ।
ओ, मानव तू क्यों भागे हैं
मन के पीछे-पीछे……. "ReNu"


Copyright© reserved by Poetess Asha Prasad "ReNu",
जब भी चमन में फूल खिले,
और तितली लुटाये अपना प्यार ।
चाँद बिखेरे जब शीतल किरण ,
और धरती ओढ़े दुधिया चुनर ।
झींगुरों ने जब छेड़े राग यमन ,
पवन के झूले में झूले प्रकृति मगन ।
स्नेह बनकर जब बरसे शबनम ,
ऐसे में
काश! तुम होते प्रियतम । "ReNu"

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